नौ महीने
हां मैं एक मां हूं ,
ज़्यादा दिन तो नहीं हुए 20 दिन हुए है। इन 20 दिनों में सब कुछ बदल सा गया है,या यू कहा जा सकता है मेरे अंदर कई बदलाव हो गए है। मेरे साथ - साथ मेरे साथ रहने वाले भी काफी बदल गए है हालांकि इस बात को कोई भी स्वीकार नहीं करेगा । पर ये सत्य है, जब मैं ऑपरेशन के लिए जा रही थी या इन नौ महीनों में ऐसा कोई नहीं जिसने ये कहा हो कि आपकी बेटी होगी । सब केवल बेटा होगा लड्डू गोपाल होगा कहते थे,कुछ लोग तंज कसने के लिए कहते बेटी होनी चाहिए। पर किसी ने ये नहीं सोचा कि एक स्त्री जिसकी कोख में एक अजन्मा शिशु है वो क्या सोचती है? सबकी अपनी राय, नज़रिया,सोच जिसे आप बदल नहीं सकते शायद लोग खुदको बदलना ही नहीं चाहते। कमियां खामियां हर किसी के अंदर होती है,मुझमें भी है पर मैं किसी पर अपनी चीजें थोपती नहीं हूं। पर यहां सब उल्टा है लोग बस अपनी जिद्द पूरी करते है। खैर ये सब जाने दीजिए
जब मैंने प्रेग्नेंसी टेस्ट किया और उसका परिणाम सकारात्मक आया तो मेरे मन में एक ही बात घूम रही थी,मैं शायद बच्चे के लिए तैयार नहीं थी पर अगर मेरे गर्भ में जीव है तो मैं उसे गिरा नहीं सकती । चाहे लड़की हो या लड़का,3 मार्च जब मैंने टेस्ट किया था , शरीर के अंदर बदलाव होने शुरू हो गए थे। मुझे चक्कर बहुत आते थे,अब भी आते है पर पहले आते थे तो सब बैठने या खाने पीने के लिए कहते थे, पर अब ऐसा नहीं है सबको लगता है बस एक ऑपरेशन ही तो हुआ है । कौनसी बड़ी बात है हमने भी बच्चा पैदा किया है हां पर वो अलग बात है कि हमारा नॉर्मल हुआ है। ऑपरेशन में बस 7 से 10 लेयर्स ही तो कटती है उसके बाद सिलाई हो जाती है। डॉक्टर कहते है 3 से 6 हफ्ते ऊपरी घाव को भरने में लग जाएंगे पर इससे क्या फर्क पड़ता है। 6 महीने अंदर के घाव को भरने में और कम से कम एक से तीन साल मां के शरीर को बनने में लगता है। पर हमारे यहां लोगों की फितरत है इसकी तुलना उससे उसकी इससे करने की। आप अंदर ही अंदर टूट गए है पर आप अपने मन की बात कहे भी तो किस से? कोई भी आपको समझ नहीं सकता है चाहे मायके के लोग हो चाहे ससुराल के ,केवल आपकी मां इस चीज को समझ सकती है। और जिनकी मां नहीं होती उन्हें ये दर्द,मूड स्विंग सब कुछ खुद झेलना है। आप अपने बच्चे को उठाने में असमर्थ हैं पर लोगों को लगता है आप उठ रही है बैठ रही है हंस रही है बोल रही है तो आप ठीक हो गई है। पर क्या वाकई? आपके अंदर से रोज रक्त स्राव हो रहा है, पैर हाथ कांप रहे है,हाथ पैर पीले पड़ गए है पर आप कुछ कर नहीं सकते है ।
एक बात है जिसकी में अर्धांगिनी हूं वो बहुत हद तक मेरा सारा काम कर देते है। पर कई चीजें वो भी समझ नहीं पाते,पर जितना समझते है वो भी काफी है। प्रेगनेंसी के पहला महीना या यूं कह ले तीन महीने मैं अपने मायके थी क्योंकि मुझे बेड रेस्ट की जरूरत थी। महीने में दो बार मुझे इंजेक्शन लगता था । मुझे हमेशा लगता था कि मेरी नॉर्मल डिलीवरी होगी पर ऐसा हुआ नहीं। चलिए जाने दीजिए ।
नौ महीनों में कितने बदलाव हुए ,आज जब में उसे देखती हूं। तो ऐसा लगता है ये कैसे मेरे पेट में थी । इसकी आंखे, नाक,मुंह,कान, हाथ,पैर कैसे रखती होगी । कई विज्ञान पढ़ने वाले कहेंगे गर्भ नली द्वारा सारा कार्य बच्चे के लिए हो रहा होगा । तर्क देना संभव है,पर मां के अंदर की भावना को समझना थोड़ा कठिन । खैर ..... पेट में उसकी हलचल महसूस करते - करते आज वो मेरे हाथ में है। उसका उठना,रोना,हंसना,मुंह बनाना सब काल्पनिक लगता है।
आज पहली बार उसने दूध पीते वक्त मेरी कमीज को अपने हाथ से पकड़ लिया । उसके छोटे कोमल हाथ, कितने प्यारे लग रहे थे काश में उन्हें नेत्रों में हमेशा के लिए बसा पाती। नेत्रों में न सही फोन के कैमरे में ही बसा लेती पर ऐसा होना मुश्किल था ,इसलिए नहीं कि मेरे पास स्मार्टफोन नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि फोन आंगन के चार्जिंग पॉइंट्स पे लगा था । और मैं कमरे में,बच्चे को अपने वक्ष से अलग करके रुला के तस्वीर लेना इतना जरूरी नहीं लगा।
भले आज मेरा शरीर बेडौल सा हो गया हो,शायद पेट पहले की स्थिति में न आए टांके जीवन भर दिखेंगे । शरीर के सारे दर्द ठीक होने में वक़्त लगेंगे या ठीक भी न हो। अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा मेरे भीतर पर इन सारी चीजों के बावजूद मां बनाना कितना मनोहर है। बच्चे की किलकारी,उसके रोने - हंसने को देखना कितना मन भावन है । मां बन गई मैं...............
Babita 💕

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