सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

प्रदर्शित

शोर!

 सन्नाटे को चीरता शोर ! पर क्या हर किसी को शोर पसंद है ? किसी की चुप्पी शायद इस शोर से अधिक भयानक हो,दर्द भरी हो ? बिना जाने कितना आसान है बड़े और छोटे का फर्क करना । पर जहां संवेदनशील लोग नहीं वहां किसी को समझा पाना मुश्किल है । शायद कल हमारे बच्चे भी इस शोर का हिस्सा बनना चाहेंगे पर क्या मैं उसे जाने दूंगी ? या फिर वो जिद्द करके चली जाएगी । पर क्या मेरी थकान मेरी परेशानी को समझ पाएगी ? या मुझ जैसे किसी व्यक्ति को ?  न जाने क्यों लगता है कि हर कोई घर के कामों को काम की श्रेणी में नहीं रखता । वहीं अगर घर में एक नौकर रख दिया जाए तो सबको बहु खटकने लगेगी,बैठे -बैठे करना ही क्या है। घर को घर बनाने में पूरा दिन चला जाता है। वो पार्क में नहीं जाती लोग क्या कहेंगे , चार दीवारों में अपना संसार ढूंढती है। घर को सजना - संवारना,बच्चे को देखना, बच्चे को छोड़कर वो गुसलखाने तक नहीं जा सकती । तो ऐसी जिंदगी किसे पसंद आएंगी,अपने शोख,अपनी चीजों को एक अंधेरे में धकेल के जीना। कितना मुश्किल है । और रात जब खुद से बात करने के लिए मिलती है तो ये शोर जहां किसी को मौत हो या किसी का दर्द उससे कही अधिक ...

हाल ही की पोस्ट

समझ ?

जनरल डब्बा

नौ महीने

बिन मां की बेटी !

घर - घर

क्रोध

जी चाहता है

बचपन जीते देखा

माधव

निर्मल