जनरल डब्बा

 कई दिन बाद आज फिर लिख रही हूं । जीवन में वक़्त की कदर करना बहुत जरूरी है,अगर आप वक़्त की कदर करते है तो वक्त आपकी कदर करता है ये तो आप सब जानते है। कुछ टूटा फूटा ही सही लिखना मुझे अच्छा लगता है, सही या गलत ये आप पर निर्भर करता है । कई परीक्षाएं देने के बाद भी असफल रही हूं, और शायद इसमें मेरी ही गलती है,मैं उतनी तेज नहीं हो पाई जिससे किताबों के पन्नों के नंबर याद हो जाए। या अपने विषय को घोल के पी जाऊं, मेरी असफलता का अफ़सोस मुझसे ज़्यादा मेरे पिता को है। बस इसलिए मुझे ज़्यादा बुरा लगता है, उनके पैसे सही जगह खर्च नहीं हुए। खैर जाने दीजिए, कई परीक्षाएं देने के बाद अब ये शादी के बाद पहली परीक्षा थी । भईया की शादी के बाद, आजमगढ़ दीदी के घर जाना हुआ । मेरा एग्जाम सेंटर भी वही पड़ा था, जाते वक्त यहां से टिकट भी हुआ था,और हम आराम से बैठ कर भी आए। पर आते वक़्त न टिकट हुआ था,न ही सीट मिली थी । शायद जीवन में ये भी अनुभव करना बाकी था,जब से मैं चीजों को समझ पाई हूं,या यूं कह लीजिए कि मेरे होश भर में मैने कई सफर तय किए। भीड़ भी देखी है,पर जनरल डिब्बे का अनुभव करना शायद बाकी था। जब से होश संभाला शायद ही मैं जनरल डिब्बे में बैठी हूंगी। 

पर इन सर्दियों में 6:50 पर ट्रेन आई। पहली बार मैने अनुभव किया कि जनरल डब्बे का सफ़र.....................

ट्रेन समय पर थी जैसे ही डब्बे के अंदर गए हर सीट पर कोई न कोई बैठा था । मेरे हाथ में बच्चा देख एक व्यक्ति ने मेरे बड़े पापा से कहा यहां बैठ जाइए और बिटिया को भी बैठा दीजिए। थोड़ी सी जगह में मैं बच्चे को लिए बैठ गई,बैठने में कठिनाई हो रही थी क्योंकि बड़े - बड़े बर्तन पैर पर लग रहे थे। और कितने प्रयास के बाद भी सामने बैठे व्यक्ति उसे हटा नहीं रहे थे जबकि खिड़की की तरफ काफी जगह थी । वो आपस में कुछ बोल रहे थे एटा अमार सीट, कुछ - कुछ बंगला भाषा मुझे भी समझ आती है। वैसे तो वो टॉलीवुड की हिंदी डबिंग फिल्म देख रहे थे । खैर जाने दीजिए सब कही एक साथ जा रहे थे । ऊपर की दो सीटों पे दो व्यक्ति सोए थे,और नीचे दो बैठे थे एक लेटा हुआ था,दूसरी तरफ दो व्यक्ति बैठे हुए थे,एक भोजपुरी फिल्मों की रील देख रहा था, दूसरा खिड़की में छोटा सा कपड़ा ठुस कर ठंड से बचने का प्रयास कर रहा था। बाएं और की सब सीटों पर कोई पतला सा चादर ओढ़े बैठे थे या कोई हाथ को पाव के बीच दबा के ठंड से बचने का प्रयास कर रहे थे। पर इन सब के बीच एक व्यक्ति लगातार बीड़ी पीने में लगा था, जिससे मुझे काफी दिक्कत हो रही थी और मेरे बच्चे को भी पर में कुछ कहने में असमर्थ थी। उसी बीच एक बच्चा 13 - 14 साल का भीख मांगते हुए दिखा उससे कोई परेशानी नहीं थी,देखने में सुंदर और स्वस्थ था काले रंग की जैकेट,पिच रंग की लोअर और हाथ में काले रंग का पट्टे जैसे था जो लड़के बाईक चलते वक्त स्टाईल के लिए लगते है। चना खरीद रहे व्यक्ति के पास जब वो भीख मांगने गया तो उस व्यक्ति ने पूछा भीख क्यों मांग रहे हो, उस लड़के ने कोई उत्तर नहीं दिया केवल अपने हाथ के तरफ देख रहा था । व्यक्ति ने कहा हाथ के वजह से लड़के ने हां में सर हिलाया उस आदमी ने 10 का नोट निकाल कर दिया उसके जाने के बाद वो मेरे बड़े पापा की और मुड़कर कहता ये हमारे कोलकाता में होता तो में ठीक से पूछता और भीख मांगने नहीं देता , किसी काम पे लगा देता।

पर में ये देख रही थी उसके हाथ और पैर फटे हुए थे जिससे ये पता चलता है कि उसे कितनी मेहनत करनी होती होगी,पैर में हवाई चप्पल है, ठंड से कान लाल थे। पर्स में मुश्किल से कुछ नोट होगे जिसमें से एक नोट उसने दे दी । जहां अच्छा कमाने वाले 1 या 2 का सिक्का ढूंढते है गरीब को देने के लिए वहीं जिसके पास कम है, पर वो सबको कुछ दे रहा किसी के लिए चना खरीद रहा तो किसी को पैसे की मदद कर रहा। इसी बीच बच्चे को भूख लग गई इतने सारे आदमियों के बीच दूध कैसे पिलाऊं ये में सोच ही रही थी कि पिता ने कहा तू एने आ जा हम ओ सीट बैठ जातानी बड़े पापा ने अपने साथ बैठे व्यक्ति से कहा आप भी जरा उठ जाइए। उस व्यक्ति ने कहा 2 तीन स्टेशन है बेटा आप बैठ जाओ। सीट की तरफ उल्टा बैठ के मैं बच्चे को शांत करने का प्रयास कर रही थी पर जो चीज मुझे अच्छी लगी सामने बैठे पुरुषों से लेकर आस पास खड़े सारे पुरुष अपने चेहरे घुमा रखे थे तो कुछ मोबाइल में लीन थे जिससे मुझे असहज महसूस न हो । गंदे कपड़े जरूर थे पर नियत साफ थी................।

हमारे स्टेशन आने से पहले वो उतरे और मानो सारा डब्बा ही खाली हो गया हो । पर सब मेहनत करके कमाने वाले थे कम में भी तकलीफों में भी खुश थे । 




Babita 💕


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