क्यों ?

 उफ़ मैं ऊब गई हूं !

घुटन महसूस हो रही है,बहुत प्रयास के बाद भी मैं वैसी नहीं रह पा रही । जैसे मैं पहले थी,बेबाक सी,अल्हड़ सी,मस्तमौला,जिद्दी,बचकानी हरकते करने वाली। खुद मैं कॉन्फिडेंट रखने वाली,हरदम हंसना - खेलना,अपनी पसंदीदा फिल्में देखना, तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखना । अब जो भी हो रहा है समाज के लिए हो रहा है,परिवार के लिए हो रहा है। मैं अगर सच कहूँ,तो खुश तो मैं हूं नहीं,कई प्रश्न है जो निरंतर चल रहे है। जिसका जवाब ढूंढते-ढूंढते थक गई हूं। मेरे पास प्रश्न अनंत है पर उत्तर एक भी नहीं, इसलिए मैं कुछ समझ नहीं पा रही।

एक नए रिश्ते में बंधने से डर नहीं लगता है! पर आज का समाज इतना पंगु है,डरपोक है सच कहने से,और सच को सहने से डरता है।एक लड़की के जीवन में कई उथल-पुथल चल रही होती है। नया घर,नए लोग, नई जगह आदि,इसके बावजूद लोग इन चीजों को लेकर निश्चिंत है। जहां ज़माना तेजी से भाग रहा है।वही कुछ लोग पुरानी रीतियों पे चल रहे है। इसमें कोई बुराई नहीं है ! संस्कारों के अनुकूल चलना सही है। पर सामने वाले को भी आज के युग के तौर तरीकों के अनुसार चलना चाहिए।क्योंकि जो लोग समय के अनुसार नहीं चलते,वे आगे चल के जीवन भर पछताते है । स्वयं को या दूसरों को दोष देते है, ये कलयुग का काल चक्र है,जिसमें सबको पीसना है और अंत में अकेले ही बैतरणी पार करनी है।

तो छल,झूठ,कपट क्यों? किसी को प्रताड़ित करके खुद को खुश रखना कहा का न्याय है। कई सारे प्रश्न इस युग को लेकर भी है। आखिर समझ का फर्क इतना कैसे बढ़ रहा है। मन की चंचलता इतनी क्यों है,विश्वास जैसा शब्द मात्र एक शब्द लगता है ।किसी पे विश्वास होता क्यों नहीं है? क्यों ?आखिर एडजस्टमेंट क्यों? 

                                  क्यों?

Babita 💕 

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट