प्रेम,प्यार, इश्क़, मोहब्बत........

 बार - बार न चाहते हुए भी, मेरा मन एक ही प्रश्न कर रहा है ,जिससे आम बोल चाल की भाषा में "प्रेम" कहते है । न जाने कितने ही लैला- मजनू बने, हीर - रांझा बने , पर आखिर "प्रेम" है क्या ? हां प्रेम जो आज के युग में ढूंढ पाना असंभव सा प्रतीत होता है ?

प्रेम की खोज मुझे कई प्रश्नों के नज़दीक ला के खड़ा कर देती है। पहला ........की आज के हिसाब से या कुछ वर्ष पूर्व को भी ले  कर चले,तो प्रेम में सौन्दर्य की प्रधानता सर्वप्रथम है, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष हर कोई बाहरी ढांचे से प्रेम करता है रंग,अंग,नाक - नक्शा,कद आदि! पर कुछ लोग इसका भी खंडन करेंगे, कि नहीं हमारी जोड़ी देखो रंग या कद देख के थोड़ी ही बनी है । परंतु जो आज कल इंटरनेट पे हीर की तस्वीर दिखा के सब कहते है रांझा इसके लिए पागल था ? आप में से कईयों ने उस तस्वीर को देखा होगा, तो फिर मेरा उन लोगों से और स्वयं से प्रश्न है प्रेम का पैमाना सौंदर्य क्यों? 

      सत्य तो ये है, कि हम सबसे पहले बाहरी ढांचे से आकर्षित होते है। चाहे स्त्री का शरीर हो,चाहे पुरुष का,फिर हम उस आकर्षण के पीछे तब तक नाचते या घूमते है, जब तक वो हमें प्राप्त न हो जाए। इसका एक कारण जो मुझे लगता है शायद ! ये भी है कि हम उस व्यक्ति के करीब होते है,स्कूल,कॉलेज,पड़ोस में रहना, एक गली, एक मोहल्ला या एक साथ ऑफिस में काम करना, किसी के रिश्ते में लगना,भाभी की बहन या फिर शादी में मिलना आदि । फिर पहले उसके बाहरी ढांचे पे मुग्ध हो जाना, और धीरे धीरे  व्हाट्सएप,इंस्टाग्राम, स्नैपचैट,टेलीग्राम,फेसबुक,आदि ,किसी भी सोशल साइट पे उससे ढूंढना और बात करना । पहले बात,फिर  आंखों ही आंखों में इशारे,फिर हाथ पकड़ना और उसके बाद प्रेम का  शारीरिक क्रियाओं  बदल जाना, या फिर यू कहिए संभोग करना ।प्रथम लक्ष्य ही शायद ! बिस्तर तक पहुंचना जिसे प्रेम का नाम दे दिया  गया है। और  अगर वो व्यक्ति पास है तो संभोग को प्रेम का नाम दे दिया गया  है,पर अगर यही लॉन्ग डिस्टेंस बन जाए तो धीरे - धीरे प्रेम छू मंत्र हो जाता है, या फिर संभोग के बाद आकर्षण खत्म हो जाता है । फिर  ब्रेकअप, और फिर नया आकर्षण दूसरे स्त्री पुरुष को देख के आकर्षित होना तो क्या इसे प्रेम कहेंगे ?

दूसरा जहां तक मुझे लगता है , किसी के धन - वैभव को देख के आकर्षित होना । की अगर में इसके साथ रिश्ता बना लूंगी या लूंगा तो मेरा कैरियर बन जाएगा । प्रेम का क्या है पैसा रहेगा तो प्रेम हो जाएगा ।पर मुझे ये मात्र एक सौदा भर लगता है। किसी के पद्म,प्रतिष्ठा,पैसा,नाम आदि के लोभ में उस व्यक्ति के साथ रहना। ताकि अच्छा पहनने,खाने,घूमने को मिले । जिसके कारण आजकल रिश्ते बहुत जल्दी ब्रेकअप तक पहुंच जाते है। और ब्रेकअप तक न भी पहुंचे तो अमीर बनने की चाह हर गलत काम करने के मोड़ पे पहुंचा देती है। आज एक व्यक्ति जिसके साथ दिख रहा/रही है,कल उसी के दोस्त,बॉस,बहन किसी के साथ हो जाते है जिसके पास अधिक धन संपति हो। पर प्रेम ! मेरे हिसाब से तो कही होता ही नहीं ऐसे रिश्तों में,काम को लेकर सीरियस होना सही है,पर हर चीज पैसे के ईद गिर्द घूमने के कारण मैं इतना कमाता हूं तुम करती ही क्या हो,या मैं बड़े पद्म पे हूं तुम कम पे। और फिर मन - मुटाव,तनाव,झगड़े,मार -पीट,गाली गलौज आदि । तो क्या इसे "प्रेम" कहना सही है ?

तीसरा, जो आजकल चलन में है,शादी करवा दो,पांच मिनट के मुलाकात में जीवन भर साथ रहने की बात हो रही होती है। पर इसमें "प्रेम" ढूंढ पाना मुझे ज़्यादा कठिन लगता है! क्यों? क्योंकि इसका पहला पड़ाव होता है, आज के युग में बायो डाटा - जिसमें रंग,कद,शिक्षा,काम,परिवार,और कैसी लड़की/लड़का चाहिए वो लिखा रहता है। गलत तो नहीं, पर पूर्णतः सही भी कहा है क्या हम कोई वस्तु खरीद रहे है,जिसके बारे में हमें ठोक बजा के देखा जाता है। पुरुष का चुनाव हो तो, रंग रूप कैसा भी हो लड़का सरकारी नौकरी में हो, छोटा परिवार हो,घर, ज़मीन,बैंक बैलेंस सब होना चाहिए। लड़की के चुनाव में, पहले रंग गोरा ही होना चाहिए भले लड़का तवा का पैनी ही क्यों न हो,पढ़ी - लिखी, चौका -बर्तन करने वाली, हंसमुख, जॉब करने वाली,और काम सुख देने वाली हो। जिसके लिए, पिता अपनी जमा - पूंजी भी दाव पे लगा देते है। या फिर कर्ज लेकर भी विवाह करते है । पर इन सब चीज से परे"प्रेम" कहा है?

जहां एक पुरुष मजदूर रूप में और स्त्री नौकरानी के रूप में मिलती है। जिसके साथ संभोग भी किया जा सकता? इतने बैंड बाजों के साथ विवाह केवल पुत्र पैदा करने के लिए किया जाता है,जिसके लिए संभोग आवश्यक है। चाहे प्रेम हो या न तो इस स्थिति में "प्रेम" किसे कहा जाता है? एक पुरुष का मजदूरों की तरह बाहर काम करना और फिर घर आ कर साथ में खाना,पीना,घूमना,सोना, इच्छाओं की पूर्ति करना ! क्या ये "प्रेम" है? 

या स्त्री, का घर के सारे काम करना,बच्चा पैदा करना,पालना और आजकल के जमाने में बाहर जॉब भी करना । किसी के साथ 20 की उम्र से 80 तक के उम्र तक, सारे उच्च - नीच,संकट,सुख -दुःख आदि में रहना। क्या इसे "प्रेम" कहते है? पर ये मुझे एक स्कैम लगता है, जिसमें समाज के डर से लोग कभी शादी और बच्चे पैदा करते है। चार लोग क्या कहेंगे उम्र बढ़ गई शादी नहीं हुई,या बच्चे पैदा नहीं किए। भले आपस में बनती न हो, पर संभोग करो बच्चे पैदा करो! तो इन सब में किसी की केयर, इच्छा की पूर्ति,बात मानना आदि को प्रेम कहेंगे ? इसके विपरित, कोई है जो समय न दे इच्छाओं की पूर्ति न करे तो वहां प्रेम नहीं है? जहां पांच मिनट के मुलाकात को, जीवन भर के लिए एडजस्टमेंट के नाम पे चलाया जाता,घर,समाज के लिए,जिसकी प्रथम सीढ़ी ही संभोग होती है! मान लीजिए कि ये ही सच्चा प्रेम है जो आपकी इच्छाएं पूरी करे,सब बात माने हर वो कार्य करे जो आपको पसंद है,आपकी तारीफ करे, तो अगर कल कोई और यही सारी चीजें करे तो तुम्हें उससे प्रेम हो जाएगा? परसो किसी और से? शायद इसलिए भी शादी आज के युग का स्कैम,दिखावा,ढकोसला,चार लोगों की इच्छा पूर्ति और बच्चे पैदा करने की साधन मात्र है। इसलिए लोग आज घर में बीवी या यूं कह लीजिए घर में पति होते हुए भी किसी और के साथ रंगे हाथ पकड़े जाते है। और जो नहीं पकड़े जाते वो जीवन भर अलग -अलग भोग चखते रहते है। क्योंकि समाज के लिए बीवी/पति है ही। तो आप ही बताइए "प्रेम" कहा है? 

जिस प्रेम की लोग बात करते है, या मिसालें देते है । असल जीवन में वो भोग की अवस्था है,जिसे आज नहीं तो कल भोगना है,प्रेम के नाम पर इच्छा पूर्ति करना है,मेरे हिसाब से चले उठे बैठे तो प्रेम वरना प्रेम खत्म,ये कैसा प्रेम है जो हो भी जाता है और खत्म भी होते रहता है । प्रेम न हुआ मानो खाना हो रोज बनाओ रोज खाओ 

पर प्रश्न तो वही का वही है "प्रेम" है क्या ?


Babita 💕 

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