बेटी से बहु !
बेटी होना कितना सरल है। न जाने मेरे मन में कितनी ही बाते चल रही है, सबसे पहली बात कि जहां मैंने अपने जीवन के 25 साल गुजारे,उस स्थान को मुझे छोड़ना होगा । क्यों ? क्योंकि ये समाज का नियम है,की लड़की की बिदाई होती है। पर क्यों ? हमेशा से लड़की ही घर छोड़ती आई है? मुझे हमेशा से लगता आया है,की पुरुषों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से रीति रिवाज़ बनाए है।
चलिए छोड़िए यहां मेरा डर कुछ और है,जब तक मैं बेटी हूं जो अजीवन रहूंगी । पर बहू ! कैसे होती है बहू? जो हर बात माने,हर काम करे,हर पीड़ा सहे ? शायद ऐसा ही कुछ ! पर बेटी भी तो यही करती आई है। तो अंतर कहा है ? खाना,कपड़े,बर्तन आदि बचपन से करते आ रही है। कुछ लड़कियां अपने मन से, कुछ घर के दबाव में,तो कुछ शौक से सीखती है।
पर बहू और बेटी में भेद कैसा ? कुछ दिन शेष है मेरे विवाह में, हर कोई कह रहा है सुबह 4 बजे उठना होगा,नहाना होगा,खाना बनाना होगा,अगर नौकरी करती हो तो वो भी करना होगा। पर ये सभी काम तो मैं बेटी हूं तब से करती आ रही हूं। और मीन मेख तो खाने में मेरे घरवाले ही निकाल देते है। जहां जाएगी वहां तेरा क्या होगा !
बहू बनकर भी तो शायद यही होगा मां बाप ने क्या सिखाया है। पर 25 साल और 5 दिन में अंतर होता है। सबके स्वाद अनुसार खाना तो होटल वाले भी नहीं बना सकते या अच्छे से अच्छा कुक भी, तो किसी की कमियां निकलना ससुराल वाले और मायके वाले होने की पहली सीढ़ी है ! तो बहू और बेटी में फर्क कैसा ?
Babita💕

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