कश्मकश

 बहुत दिन बाद न जाने क्यों कुछ अजीब सा चल रहा है, मेरे अंदर । काफी समय से मैं मां को बहुत मिस कर रही हूं । सगाई के दिन से लेकर आज नए साल में जैसे मां को देखना चाहती हूं । उस से अपनी मन की बाते कहना चाहती हूं। दीदी और भईया की शादी में मां थी । कितने किस्मत वाले है वो,मां जानती थी कि मैं किसी से कुछ कह नहीं सकती फिर क्यों मुझे इस तरह छोड़ के चली गई ? कितने सवाल है मेरे अन्दर! मां होती तो शायद सवाल भी न होते ! पर एक नए पड़ाव पे जा रही हूं ऐसा लग रहा है। सब कुछ नया सा होगा,पर क्या वहां मुझे लोग समझ पाएंगे ? क्या मैं उन सबको समझ पाऊंगी?पहले दिन क्या होगा ! मुझे तो अपने घर के अलावा कही नींद भी नहीं आती । 2 साल बी एड किया वो भी अपना ही गांव था,पर वहां भी मुझे नींद नहीं आती थी। दिन भर डर लगा रहता था, की कही कोई कुछ कहे न । आज भी कुछ ऐसा ही लग रहा है ।

मां तुम बहुत सुंदर हो । जानती हो जब भी मुझे नींद नहीं आती तो ऐसा लगता है तुम पीछे से मुझे वैसे ही पकड़ती हो जैसे बचपन से पकड़ती आ रही हो। अब कोई मुझे पानी पीने का याद नहीं दिलाता में सुबह से शाम तक बिना पानी के ही रह जाती हूं। पता नहीं क्यों आज भी ऐसा लगता है कि तुम मुझे सुन सकती हो देख सकती हो । बस मैं ही हूं जो तुम्हे देख नहीं पा रही,मुझे नहीं पता इस नए सफ़र में मैं कितनी दूर चल पाऊंगी। पर मैं पूरी कोशिश करूंगी जैसे तुम रही बड़ी मां के साथ मैं भी वैसे ही रह पाऊं। रिश्तों को समझ पाऊं,मां बस मेरे साथ हमेशा ऐसा ही रहना ।

मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इतनी बड़ी हो जाऊंगी कि किसी का घर संभालूंगी। अक्सर दी के बचकानी हरकतों पे कहती थी न, मुझे बड़ा होना चाहिए था । सच में मैं बड़ी हो गई, जहां जा रही हूं वहां पद में बड़ी हूं मैं । पता नहीं में कैसे कर पाऊंगी कुछ ,आज तक यहां की छोटी बेटी रही हूं। काम काज तो मैंने संभाला है,सब तुमने ही सिखाया है। पर बड़ा होना बहुत कठिन लग रहा है। तू जानती है मैं। कभी काम से नहीं भागती न लोगो से भागती हूं। पर फिर भी डर लग रहा है,तू होती तो तेरी गोद में सिर रख लेती । और तू मेरी सिर की मालिश कर देती । तेरे जाने के बाद तेल जरूर लगाया पर वैसी मालिश कभी खुद से हो नहीं पाई। 

मां अच्छा बुरा तो नहीं पता पर इतना पता है,शायद मुझे वक्त लग जाए । सब कुछ समझने में,वैसे तू है जानती हूं,पर घबराहट भी है। आकाश मैं तेरी साड़ी पहन पाती और उसी साड़ी में शादी कर पाती।कुछ और नहीं बस तुझे खुद में समेट पाती । वहां कितने सारे नियम है मैं नियम का पालन कर पाऊंगी कि नहीं। मेरे एक और मन था कान्हा जी को अपने साथ ले जाने का, यहां कोई उनकी सेवा कर पाएगा कि नहीं। थोड़ी बहुत मैं कर भी देती हूं बाकी लोग कर पाए या नहीं। मेरा मन और एक चीज करने का था,शादी के बाद वृंदावन जाने का पर मैं किसी को इन सारी चीजों के लिए फॉर्स नहीं कर सकती। पर ठीक है सब कुछ बस मन ही बेचैन है ।



Babita 💞

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