एक्सपेंसिव
मुझे नहीं समझ आ रहा पर एक सवाल बार -बार घूम रहा है । क्या मैं इतनी एक्सपेंसिव हूं ? जिसके लिए बहुत कुछ सोचा जाए ! पहली बार अपने अब तक के जीवन में किसी को ऐसे देखा है । मै आज तक अपने कल को लेकर इतना चिंतित नहीं हुई, जितना मुझे लेकर मेरा हमराही चिंतित है। कही मैं उसके ऊपर बोझ तो नहीं ? क्या किसी के जीवन में प्रवेश करने का अर्थ ये तो नहीं, कि वो भविष्य की प्लानिंग करे ? अपने आज को नकार के ? क्योंकि मेरे लिए तो मेरा जीवन एक दिन,एक घंटे,एक मिनट या यूं कहला एक पल का , न जाने मेरी सांसे कब मेरा साथ छोड़ दे! कितना कुछ चल रहा है मन में ऊपर से बोझ वो भी मैं ? क्या मैं भी फालतू खर्चे करवाऊंगी ? औरों की तरह मुझे भी अनावश्यक चीजें चाहिए होंगी? हां मैं अपने कमरे को अच्छे से रखना चाहती हूँ पर इसमें भी खर्चे होंगे । पर जहां तक मुझे याद है ! जब से मैंने होश संभाला है,आज तक मैंने कोई जिद्द नहीं किया ।
पर क्या कोई मेरी ज़िद्द पूरी भी कर सकता है ? कहा मुझे हर छोटी चीज पसंद आ जाती है। कहा लोग मुझे पैसे से तोलते है! कई बार लोगों की इन बातों पे हंसी भी आती है,तो कई बार क्रोध भी । शायद इसलिए मैं काम करना चाहती थी पर पैसों के लिए नहीं सुकून के लिए। जब तक शिक्षिका रही,मैने पैसे से अधिक प्रेम और सम्मान कमाया । पर आज का जीवन मेरे जीवन से भिन्न है । मैं तो दो प्याली चाय की ,साथ में बैठ के पीना चाहती हूं। की किसी के गोद में सिर रख के घंटों सोना चाहती हूँ। रात को सुनसान पड़ी सड़क पे हाथों में हाथ डाल के चलना चाहती हूँ। एक भरा पूरा परिवार जिनके साथ छप्पन भोग न सही पर नामक रोटी के साथ दो मीठे बोल बोलना चाहती हूँ।
उफ़ कितना कठिन है मेरे लिए !
सब कुछ अलग सा लग रहा हैं। और सच में मुझे नहीं लगता कि कोई मुझे समझ सकता है। जब यहां लोग नहीं समझ पाए तो वहां कैसे समझेंगे । सुकून की तलाश करना बहुत कठिन है, शायद इसलिए मेरी सबसे अधिक शर्मिला भाभी से बनती है । बनने को तो हर भाभी से बनती है, पर शर्मिला भाभी के साथ दोस्त वाला रिश्ता है। घंटों हम छत पे बैठे रह जाते थे कितनी बाते कर जाते थे। संजय भैया के बाद भाभी के साथ एक प्लेट में खाना खाया है। पर वो मेरी शादी में नहीं आ सकती,क्यों? क्योंकि उनके भाई की शादी है । वो भी जरूरी है, इसलिए मैं शादी गांव से करना चाहती थी। पर मैं अब कर भी क्या सकती हूं।
फिर मिलना है मुझे भाभी से बस और एक किरण से बाकी मुझे और क्या चाहिए। कोशिश करनी होगी मुझे भी की मैं किसी पे बोझ न बनू। पर पैसे कमाना नहीं आता मुझे, जब पढ़ाया तो सिर्फ पढ़ाने पे ध्यान दिया। मन मार के ट्रांसलेशन वाला काम भी किया। और जिसने जितना दिया उसे खुशी -खुशी लिया भी । पर सुकून तो मुझे स्कूल में ही मिला है,बिना धन अर्जन का सोच के जब में बच्चों को पढ़ती थी। मानो सुकून मिल जाता था। अब वैसा पल आना मुश्किल सा लगता है। मै हमीदा, अनुष्का का साथ में पढ़ना, खेलना,घूमना सारी चीजें वापस जीना मुश्किल है।
मां के साथ दिन भर बच्चों की तरह चिपके रहना,कुछ भी ट्राई करना ड्रेस हो या खाना मां ने कभी टोका ही नहीं। दीदी तो आज तक शॉर्ट ड्रेस खरीद देती है। कम है उसके पास पर मेरी हर ख्वाइश पूरी करती है। इन लोगों को मैं कभी एक्सपेंसिव या बोझिल नहीं लगी । तो आगे भी किसी को नहीं लगूंगी क्या ? कितने सवाल है मन में ?
Babita 💕

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