पुरानी यादें


 

तस्वीरें इतनी साफ नहीं है,पर एक चीज जो साफ है मेरे जहन में वो है यादें सबसे ज़्यादा पांच भाइयों की। शुरुआत जिसके साथ मेरा बचपन और आज तक का समय बीता है, हां अब वो पहले की तरह प्यार नहीं जताता पर शायद किसी कोने में मेरे लिए वही प्यार हो जो पहले हुआ करता था। जब में छोटी थी तो दीदी और भईया दोनों के बीच में सोती थी। वो दोनों सुबह उठते ही मेरे गाल खींचते थे,हां काफी मोटी थी" मैं " । दीदी की शादी जब तक नहीं हुई तब तक वो मुझे एक काम करने नहीं देती थी,भईया मेरी हर ख्वाइश पूरी कर देता था। मुझे किसी और का खिलौना न लेना पड़े इसलिए खुद ही खरीद देता था। मां मुझ पर गुस्सा करती तो मुझे अपने पीछे छुपा लेता। पर मां गुस्सा नहीं करती थी बस हम तीनों को हल्का सा डांटती फिर खुद गले लगा लेती। अब गले लगाने के लिए कोई है ही नहीं। जब पहली बार मैने पोंछा लगाया था मेरे हाथ में छाले हो गए थे, भईया ने कितना गुस्सा किया था इससे क्यों पोंछा लगवाया । कहता मैं लगा देता हूं इससे मत बोला करो । पर पहले और अब में अंतर आ गया है, दीदी भी खुद से ज्यादा मेरा और भईया का ख्याल रखती थी या यूं कहूं कि रखती है। आज भी वो उतनी ही चिंता करती है जितनी मां करती थी । पर उसे कई लोग गलत समझते है पर जितनी मन की वो साफ है उतना कोई नहीं है । हां जितना जल्दी गुस्सा होती है उतना जल्दी मान भी जाती है। एक छोटे बच्चे की तरह उसके मन में किसी के लिए कोई बैर नहीं है। पर ससुराल उसके हिसाब से नहीं मिला वो एडजस्ट कर चुकी है पर खुश शायद नहीं है । दो बच्चों की मां जो है एडजस्टमेंट तो करना होगा ऊपर से कलकत्ता पास भी नहीं,और मायका बिन मां के किसी का वाश नहीं। चलो ये सब जाने दो, जब सिर्फ हम तीनों थे ऐसा लगता था हमें किसी की जरूरत नहीं। पर दोनों की शादी के बाद सब बदल गया । 
कल लिखते लिखते मैं आधा ही लिख पाई थी।
बदलाव संसार का नियम है,एक छोटी सी लड़की जो पापा के ऑफिस से आते ही उनके गोद में बैठ जाया करती थी,जिसका भईया उसके आंख में आंसू देख नहीं सकता था,जिसकी दी घर का एक काम नहीं करने देती थी। अब कुछ दिन बाद उस लड़की की बिदाई है। नया घर, नए लोग,और कुछ नई सी मैं । यहां सबको ऐसा नहीं पसंद,वैसा नहीं पसंद शायद मैं इस तरह बबीता होने की पहचान खो दूंगी! किसी की बहू,किसी की पत्नी,किसी की जेठानी, किसी की देवरानी,किसी की भाभी,किसी की मां हो जाऊंगी । पर बबीता नहीं हो पाऊंगी, बात कहा से कहा पहुंच गई।
सबसे ज़्यादा जिन भईया के साथ में घूमी हूं वो है संजय भैया । हां ऊपर तस्वीर में जिन्होंने नीला कुर्ता पहना है,और मैने लाल कुर्ती। इनके लिए में छोटकी हूं जिसे ये बचपन में साइकिल पे घुमाया करते थे। ये चीज मुझे याद नहीं मां हमेशा बताती थी,मुझे सुलाना,फिल्म दिखाना,और अपनी प्लेट में खाना खिलाना । सबसे ज़्यादा मैं इनके साथ ही खाना खाई हूं शायद पंछी के होने के बाद भी। जिस दिन इनकी प्लेट में नहीं खाती लगता ही नहीं कि मैंने खाना खाया है। दोनों दीदी बहुत जलती थी क्योंकि ममता दी और मेरी दी को भैया प्लेट के पास तक नहीं आने देते थे। बाजार से जो लाते सबसे पहले मुझे देते,जब तक मैं मांसाहारी थी तब तक मछली का कांटा तक वही निकाल के खिलते थे। पर आज मेरी शादी पे वही नहीं आ पा रहे क्योंकि उनके साले की भी उसी दिन शादी है। और इनकी पत्नी और मेरी भाभी,शर्मिला भाभी जिनसे मानो दोस्त वाला रिश्ता है। हर बात कहना सुनना,साथ में शॉपिंग जाना,पार्क जाना,नई डिश बनाना,और मेरे साथ खाना भी खाना भईया के बाद जिसके साथ खाई हूं वो भाभी है। सबसे अच्छी,बोलती तो वो मुझे बबीता जी है ,पर है बहन जैसी । वैसे तो गांव की हर भाभी मुझे बबीता जी बोलती है,सिवाय मेरी भाभी को छोड़ के, और ठीक भी है। शर्मिला भाभी वो है जिन्होंने ऊपर तस्वीर में काली साड़ी पहनी है,और मैने व्हाइट जींस,ब्लैक टॉप। इस दिन हम सहतवार पार्क गए थे सारी भाभी लोग बच्चे , उस दिन मेरी जिम्मेदारी पे सबके सास ससुर ने बहुओं को जाने दिया था। शायद यही कारण है या यू कहलों हर भाभी के साथ मेरी बॉन्डिंग अलग है। किसी से मजाक वाली, किसी से टकरार वाली हा हा हा हा हा आप लोग नहीं समझेंगे।
शर्मिला भाभी और मैं एक ही स्कूल में पढाते भी थे। जी हां शिक्षिका है भाई हम दोनों,मैं कभी अपना जॉब नहीं छोड़ना चाहती थी । पर मजबूर थी,इसलिए तो संजय भैया - भाभी मेरी शादी गांव पे करवाने के लिए लड़के ढूंढ रहे थे।ताकि मैं उनसे दूर भी न रहूं और स्कूल दुबारा से ज्वॉइन कर लू। सच तो ये है कि उस स्कूल के पैसों से घर खर्च नहीं चल सकता था। पर मुझे उन बच्चों की फिकर थी जो प्राइवेट स्कूल के नाम पे ठगे जा रहे थे। उनके पेरेंट्स जो खेती,मजदूरी करते है,जिन्हें अंग्रेजी क्या हिंदी भी समझ नहीं आती थी। जो बस अपने बच्चों को अपनी तरह नहीं बनाना चाह रहे थे। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं स्कूल से आ के सो रही थी तभी बेल बजी । मां ने दरवाज़ा खोला और कहा मैडम सोई है कल आयेगा। तब बड़ी मां भी थी कहती बुला दो कुछ काम है। मां बड़ी मां की कोई बात नहीं टालती थी मुझे उठा के ले आई। जब मैने देखा एक आदमी अपने एक बच्चे को साथ लिए बड़ी मां के साथ खड़ा था। मुझे देखकर या मेरे पहनावे को देख के थोड़ा चकित हुआ,क्योंकि मैने ट्रांसपेरेंट शर्ट और टाइट फिटिंग लैगिंग्स पहना हुआ था । जो शायद उसने पहली बार देखा था,वो कहते आप ही बबीता मिस है ! मैने कहा हा...........फिर उसने कहा मैडम आप मेरे बच्चे को ट्यूशन पढ़ा दीजिए न,पता नहीं मुझे ट्यूशन एक बेफिजूल टाइम पास लगता है। मैंने कहा देखिए भईया आपका बच्चा एल के जी में है आप ही लोग घर पे पढ़ा सकते है। इनकी मां या आप ही पढ़ा लीजिएगा, तब उन्होंने कहा मैडम हम दोनों ही अनपढ़ है, यहां गन्ना का रस बेचते है । आपका नाम बहुत सुना है दिल्ली वाली मैडम अच्छा पढ़ाती है । बहुत उम्मीद ले के आइल बानी। आप पढ़ा दी ............. जानते है आप लोग उस दिन मुझे ट्यूशन की फ़ीस जो ऑफर हुई आज तक किसी ने ऑफर नहीं की थी रोज एक जग गन्ने का जूस ..............हा हा हा हा हा । आज लिखते समय भले ही हंस रही हूं पर उस दिन अपने पढ़े लिखे होने का महत्व समझ आया । जी हां मैं पढ़ाने लग गई,किसी के जूस पिलाने पे,किसी के एक मुठ्ठी अनाज पे , बिना पैसों के ,तो कोई 200 रुपए ले कर आते थे। तीन चार भाई बहन एक के साथ एक फ्री, स्कूल से आते ही मानो मेला लग जाता था।
मेरे स्कूल ज्वाइन करने की भी एक कहानी है। या यूं कह लीजिए एक किरदार है .............................मेरी भतीजी जी पंछी जो नई - नई स्कूल जाना शुरू करने वाली थी । पड़ोस में ही स्कूल था, स्कूल में टीचर की जगह खाली थी । बड़े पापा मेरे लिए बात कर आए थे, इंटरव्यू होना था । उस वक्त तक मैं कभी पढ़ने या टीचर बनने का सपने में भी नहीं सोचती थी। पर बड़े पापा बात कर आए थे उनकी बात कौन टाले मां - पापा ने कहा जा देख आना । अभी तो इंटरव्यू है,जानते है उस दिन इंटरव्यू देने क्या पहन के गई थी शॉर्ट्स और स्लीवलेस टॉप ............हा हा हा हा हा हा आज भी वो दिन सोच के हंसी आ जाती है । वहां के मैनेजर और प्रिंसिपल ने बहुत घूरा पर बाद में इंटरव्यू लिया । और मुझे लगा मेरी ड्रेसिंग के वजह से मुझे रिजेक्ट कर देंगे । पर अगली रोज बड़े पापा कहते बबीता को पढ़ने के लिए बुलाया है। और पंछी का एडमिशन भी उसी स्कूल में हो गया है। मां - पापा,और हा जी मेरा भईया जो फर्रुखाबाद था कहता जब तक है पढ़ा ले पैसे नहीं भी देंगे तो एक्सपीरियंस होगा । भईया या मां - पापा की बात आज तक मैंने नहीं टाली। पर मेरे पास सूट तो एक भी नहीं थे जो स्कूल पहन के जा सकती । तो क्या पापा ने कहा स्कूल के लोग तुम्हारे कपड़े नहीं तुम पढ़ाती कैसा हो ये देखेंगे। उफ फिर क्या बैक से ट्रांसपेरेंट टॉप और जींस पहन के पहुंची मुझे छोटी क्लास में भेजा गया और पंछी भी मेरे साथ थी। वहां के हिसाब से टीचर नहीं लग रही थी सब एक कोने में मेरे बारे में चर्चा कर रहे थे। मुझे जो क्लास मिली थी उसमें दो टीचर थे एक मैं गई तो तीन । प्रिंसिपल मैडम एक को अपने साथ ले गई, नेहा और मैं एक क्लास में पढ़ा रहे थे । उस स्कूल के हिसाब से नेहा को इंग्लिश बहुत अच्छी आती थी । इसलिए स्कूल वालो ने मुझे नेहा के साथ रखा। पर नेहा को इंग्लिश उतनी ही आती थी जितना एक साउथ इंडियन को हिंदी जी कामचलाउ । इतनी स्पेलिंग मिस्टेक,जब तक नेहा मेरे साथ थी मैने एक शब्द नहीं कहा उससे न उसने मुझसे पर इतनी गलती देख के मुझसे रहा नहीं गया और लंच ब्रेक में नेहा खाना खाने गई मैं कुछ लाई नहीं थी । तो मैं बच्चों के साथ बैठ कर नेहा की गलतियां मिटा रही थी । क्योंकि come, go,school,bag,bat जैसे शब्दों में गलती हो जाए बहुत अजीब बात है,बोर्ड पर जब ये सब मै कर रही थी मुझे क्लास के बाहर से आवाज आई प्रिंसिपल मैडम आपको बुला रही है। मुझे लगा आज से मेरी छुट्टी.......... मैं प्रिंसिपल मैडम के केबिन में गई । मैडम ने एक पर्चा दिया कहा ये आपका टाइम टेबल है,4,5,6,7,8 को आप पढ़ाएंगी वो स्कूल वैसे भी आठवीं तक ही था । और मुझे इंग्लिश, ईवीएम,साइंस,जीके,सोशल साइंस सब दे दिया गया था हर क्लास में वैसे मैने हिंदी में स्नातकोत्तर किया है । पर मैं अंग्रेजी में लिखी हर किताब पढ़ा रही थी। और उस पर भी सोने पे सुहागा ये हुआ कि एक रोज गलती से ऐसे ही बच्चों की नोट बुक देखते - देखते गलतियां ठीक करने लगी । तो प्रिंसिपल मैडम ने गलतियां सुधारने का काम भी मुझे दे दिया। उस स्कूल में 14 टीचर थे ! पर सही मायनों में केवल 4 एक हिंदी के टीचर आलोक सर जी,मैथ्स के अजय सर जी,साइंस की अंजू मैडम जो प्रिंसिपल भी थी,और शायद एक मैं जिसके भरोसे हर सब्जेक्ट छोड़ दिया जाता था। पेरेंट्स की कम्पलेन किसी भी टीचर के खिलाफ आए पर सही करने की जिम्मेदारी मेरी होती थी। जिनका वो स्कूल था,उन्होंने आधे टीचर भाईचारे में रखे थे,अब बदलाव भले किया हो ! 
मुझे पता ही नहीं चला वो स्कूल और पंछी, मेरे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन जाएंगे। पंछी शुरू में स्कूल में बहुत रोती थी । पर धीरे - धीरे आदत हो गई उसे, उसके लिए में उसकी पहली बुआ थी शायद । मेरे साथ सो जाती थी,खेलती थी,पढ़ती थी,डांस करती थी सब करती थी। पंछी पिंक फ्रॉक पहने ऊपर तस्वीर में मेरे साथ खड़ी है मैने ब्ल्यू कलर की साड़ी पहनी है। कितने अच्छे पल थे वो । जहां मैंने पैसे से अधिक प्रेम,अपनापन, कमाया था। मानो सारे बच्चे मेरे अपने हो,उनका लंच न आता तो अपना लंच देना,उनके साथ हंसना बोलना,उनका डर खत्म करना,खेल - खेल में कई सारी चीजें पढ़ाना।
सबसे ज़्यादा खुशी तब मिलती थी जब गरीब माता - पिता मुझे आशीर्वाद देकर जाते थे। वो फटे हाथ जब मेरे सर को छुते तो मानो मैने गंगा स्नान कर लिया हो ।
वो स्कूल केवल स्कूल नहीं था मेरे लिए एक मंदिर था जहां मुझे सीखने को मिला,खुलकर जीने को मिला। एक ऐसा जीवन जिसमें बच्चों को देखते ही मेरी सारी थकान उतर जाती थी। ऐसा नहीं है कि मुझे और अच्छे स्कूलों से बुलावा नहीं आया , आया कुछ मुझे प्रिंसिपल बनाना चाहते थे । कुछ मोटा पैसा देना चाहते थे,पर मैं जाना ही नहीं चाहती थी पैसों के लिए इन बच्चों को छोड़ कर । 
पर जब भईया ने एक साल बाद मां और मुझे फर्रुखाबाद बुलाया जी शुरू से हम हर जगह साथ ही रहे है,पापा असम राइफल्स में थे। तो ट्रांसफर की आदत हो गई थी हमे। पर इसलिए मेरा एक जगह दिल लगने पर कही और जाना पड़ता था तो बहुत बुरा लगता था। उस दिन भी मुझे बहुत बुरा लगा सब मुझे समझाते अरे कौन सा सरकारी नौकरी है , वैसे भी तुझे तो पढ़ाने का मन नहीं था ? यहां अकेले कैसे रहेगी मां को भी देखना है उनकी तबियत तो तू जानती है न । मैं कितना रोई थी तीन रोज में निकलना था,स्कूल में बच्चों से लिपट के रोई थी उस दिन मैनेजर सर के सामने भी अपने आंसू नहीं रोक पाई थी । जब पेरेंट्स को ये बात पता चली सब निराश हो गए थे,ट्यूशन के बच्चे अलग । जाने के दिन तक बहुत रोई और पंछी से दूर हो के और बुरा लग रहा था। जब मैने फर्रुखाबाद से वीडियो कॉल किया था पंछी और मैं दोनों रो रहे थे एक तीन साल की बच्ची को मुझसे दूर होने का एहसास था । आज वो बच्ची मेरी शादी में नहीं आ सकती क्योंकि उसके अपने मामा की शादी है उसी दिन । मेरी इन सारी भावनाओं को कोई नहीं समझ सकता सबके लिए बस ये रिश्ते है। पर किसी को क्या पता मेरे लिए जीवन का अटूट हिस्सा है । अगर भगवान से कुछ चाहती तो पंछी को बेटी के रूप में अपने अंग से जन्म देना चाहती । जो आज भी फोन पे आवाज़ सुनकर ये बता देती है उसकी बुआ रो रही थी,या चिंता में तो नहीं है,जो मेरी मां के जाने के बाद मेरे आंसू पोछने आई थी,मेरी एक आवाज़ सुनके मुझसे लिपट जाती है। कैसे बताऊ क्या रिश्ता है उसके साथ मेरा,मेरी सगाई के बाद मेरे पास ये आकर कहना बुआ अब फूफा जी मिल जाएंगे तो आपको मेरी याद नहीं आएगी ? अब फूफा जी आपको बलिया लेकर नहीं आयेंगे न? कितना अपनापन था इन सारी बातों में,जिसे शब्दों में पिरो पाना मेरे लिए कठिन है। सब कुछ मिल भी जाए तो भी पंछी जैसी मिलना न मुमकिन सा लगता है। घंटों मेरे साथ वो बैठी रही सगाई वाले दिन मेरे गोद में, सबने शादी की तारीख अपने हिसाब से रख दिया । पर खोया तो मैने अपनी भतीजी से मिलना उसका मेरी शादी में डांस करना,मेरे साथ बैठना ये सब का मोल शायद ही कोई चुका सकता है। संजय भैया और भाभी का न आना एक बार के लिए चल सकता है,पर पंछी का न आना बहुत खल रहा है।
यादों के पिटारे में और रिश्ते है सबकी अपनी एक अलग जगह या यूं कह लीजिए महत्व है। शायद मेरी भावनाओं को समझ पाना बहुत कठिन है। 










Babita 💕 🧿 


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