बदलाव

कितना कुछ बदल गया है। पहले सिर्फ किसी की बेटी या बहन थी,अन्य रिश्ते भी थे और है भी । पर पत्नी का रिश्ता कुछ अलग है,मांग में सिंदूर,माथे पे बिंदी,हाथों में चूड़ियां । कितना अलग सा जीवन हो गया है। एक अनजान सी जगह, अनजान से लोग अपने हो गए है, और जो अपने थे वो अनजान ही मानो। आज पापा आए तो,पर न जाने क्यों मुझे देख ही नहीं रहे थे। न भईया इतने आंसू छुपे थे दोनों के अंदर । पापा तो बिना मिले,बिना नजरे मिलाए बाहर निकल गए। मां भी ऐसी ही थी जब तक मैं पास थी किसी ने प्रेम नहीं जताया,और आज ऐसा लग रहा है मानो प्रेम का गुब्बार फुट पड़ा हो। 

पुरानी बाते कितना कुछ याद दिला जाती है मुझे पर याद करके भी क्या फायदा है! हर किसी को वहां भी और यहां भी मुझसे उम्मीदें है मैं सब संभाल लूंगी । पर वाकई ? कितना कठिन है मेरे लिए पहले ये समझना कि किसे क्या पसंद है ! कैसे रहते है,अभी तो मैं केवल एक कमरे तक सीमित हूं । पर जब इस कमरे से बाहर निकालूंगी तब जाकर मुझे कुछ समझ आएगा । एक बात मुझे पता है कि मैं कभी किसी को खुश नहीं कर सकती हूं । सबके दिल मैं किसी एक की अहमियत अधिक होती है । यहां भी होगी ! किसी की जो पहले से रह रहे होंगे। 

मैने हमेशा से खुदको बदला है,पर मैं कब तक अपनी पसंद की चीजों को यूं ही नजरअंदाज करती रहूंगी। खाना पानी सब तो बदल दिया,जीने का तरीका भी,और गृहणी बनने का भी। मैं कभी ये नहीं करना चाहती थी,पर जो सोचा हो वो ही होगा ये भी कठिन है। ऊपर से सबको धन की आकांक्षा है और मुझे सुकून की दो रोटी की ।क्योंकि मुझे पता है एक पिंजड़ा बदला है,रहना तो पिजड़े में ही है।

कितनी उम्मीदें है सबको मुझसे,पर इन्हीं उम्मीदों से डर लगता है । किसी की भाभी,किसी की जेठानी,किसी की देवरानी,चाची और मामी हूं । और सबको चाहत है किस चीज की ये मुझे नहीं पता ! पर मेरी नन्द की आँखें जैसे बहुत कुछ बोलती है। जैसे सुखी धरती पे पानी की एक बूंद की तलाश हो । बाकी सबका तो में नहीं कह सकती, पर दी स्वाभिमानी है,उन्हें बस लगता है कि कोई उन्हें इस घर में रहने के लिए ताने न दे। जी छोड़ के काम करती है। उनको देख के मुझे अपने दिन याद आ जाते है। मैं भी तो ऐसी ही थी ,कभी - कभी लगता है मैं आईना देख रही हूं ।बिल्कुल मैं हूं अंधेरे में उजाले की तलाश करती हुई ।
कितने प्रश्न है मन में और ये प्रश्न न जाने कब खत्म होंगे ।



Babita 💕

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