मेरा मन

 कितना कुछ अलग हो गया है,मैं 27 जनवरी को यहां आई थी । आज लगभग 22 दिन हो गए,इन बाईस दिनों में कितना कुछ बदल गया हैं। यहां का खान - पान,रहने का सलीका,बाते, कुछ अलग है तो कुछ एक जैसी । मैं कितना शांत रहती थी कम बोलना,कम मिलना पर अब , जहां आई हूं भरा पूरा परिवार है । बचपन से लेकर आज तक शहरों में रही,बड़ा परिवार होते हुए भी कभी साथ रहने का मौका नहीं मिला। पापा फौजी थे अब रिटायर हो गए है । और हम तीनों को काबिल बनाना चाहते थे पापा । इसलिए शहर में रहे घर से दूर सारी सुख सुविधा दी । पर काबिल भैया हुआ, मैं और दीदी तो गृहणी हुए। ह्म्म्म ...................इस नए घर में मुझे एडजस्ट करने में वक्त लगेगा क्यों ? क्योंकि यहां का खाना मानो मिर्च का ठेला हाहाहाहाहा..........जी मेरे यहां भी तीखा बनता था पर केवल मिर्च शायद ही! मैं इतने गांव और शहरों में रही हूं हर जगह का खाना खाया पर यहां की तरह मिर्च वाला खाना शायद ही मैंने चखा होगा । और एक यहां खाना रिपीट बहुत होता है,सारी चीजें मुझे अच्छी भी लग रही है । पता नहीं पर ऐसा लगता है कि मैं पहले यहां रह चुकी हूं, जितना नया लग रहा है । उतना ही पुराना भी लग रहा है,ऐसा लगता है 22 दिन नहीं 22 साल यहां बीता चूंकि हूं। पापा की याद आती है जितने पास है मन करता है दौड़ के चली जाऊं। पर जाऊंगी तो उनको मेरी आदत लगी रहेगी,और किसी भी चीज़ की आदत ज्यादा लगना सही नहीं है। और मेरी आदत किसी को लगे ये मैं नहीं चाहती, यहां आने के बाद मेरी भूख प्यास मानो मर सी गई है मन ही नहीं करता कुछ खाने पीने का, शायद खुदको मुझे इस माहौल में ढालने में वक्त लगेगा कितना ये तो मैं नहीं जानती ।


Babita💕

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