अंतरमन

 मुझे अब कुछ अच्छा नहीं लग रहा । न मुझे शोर अच्छा लग रहा है न ही शांति,मन कर रहा है कही चली जाऊं कही दूर । पर कहा इसका उत्तर नहीं है मेरे पास,जैसे लग रहा है कि मैं तृप्त ही नहीं हुई। जैसे मुझमें कुछ अधूरा है,मुझे पढ़ना कितना पसंद है। पर पता नहीं क्यों मैं अपने लिए कुछ कर ही नहीं रही हूं। बस जो जैसा ढालना चाहता है मैं ढल गई हूं। मेरा मौन गलत है? तो मैं बोलूं किससे और क्या बोलूं ? कितने प्रश्न है जहन में पर सब धरा का धरा है,अगर मैं नाराज नहीं हूं किसी से तो मैं इतना चुप क्यों हूं। क्यों मुझे कुछ भी अपना सा नहीं लगता सब गैर सा है ।

या यू कह लीजिए मैं ही गैर हूं। क्या मैं अधिक सोच रही हूं ? पर क्यों फिर वही बंदिशे नजर आती है मुझे। पढ़ना क्या कमाने के लिए होता है। क्या अपने सुकून के लिए कोई पढ़ नहीं सकता या फिर पढ़ा नहीं सकता ? 

पुरुष प्रधान समाज में स्त्री का आगे बढ़ना कठिन है? या नारी का नारी के प्रति ही द्वेष भावना होना । मैं खुलकर बोलूं तो गलत है क्योंकि हर कोई तराजू लिए बैठा है। ये अच्छा ये खराब तुम्हें इसके तरह बनना है। क्यों बनना है पर मैं "मैं" क्यों नहीं रह सकती। अपने में मस्त सी जो आया उसे उसी की तरह अपनाने के लिए तैयार ।

मेरे साथ ऐसा हुआ था,आप आई तो ऐसा नहीं हुआ ? पर मुझे इन सारी चीजों से लेना ही नहीं । फिर भी सब लगे है वो अंग्रेजी का शब्द है न पोक करने में,पढ़ी लिखूं हूं, मां - पिता के संस्कार है इसलिए में किसी को रंग,रूप, पहनावे आदि को देख कर मूल्यांकन नहीं करती । पर जो मेरे लिए कर रहे है उनकी नकारात्मक छवि बन चुकी है । जिसे शायद ही भविष्य में मैं बदल पाऊं, मुझे किसी से कोई चाहत है ही नहीं । 

पर धीरे - धीरे छवि साफ हो गई है। उम्मीदें इंसान को तोड़ देती है।पर मेरे शब्दकोश में उम्मीद जैसा शब्द ही नहीं है। अपना मानने वाले लोग उम्मीद क्यों लगाए सीधे हक जताए,तुलना क्यों करे दूसरे की कमी को भी सावरे। गाड़ी का एक पहिया न हो तो गाड़ी नहीं चल सकती,भले ही तीनो पहिए सही क्यों न हो। ऐसा ही परिवार के साथ भी है। पर परिवार माने तो सही दिखावा एक दिन चल जाएगा जीवन भर चलना नामुमकिन है ।


Babita💕🧿

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट