क्रोध

 क्रोध ?

हां किसी न किसी को कभी न कभी क्रोध तो आता ही है । पर किसी को कम या किसी को ज़्यादा,किसी को हर छोटी बात पे,तो किसी को एक आद बार क्रोध आता है। पर क्यों? आख़िर क्यों आता है ये क्रोध ? जहां तक मुझे लगता है कुछ लोगों को क्रोध तब आता है जब कोई उनकी कही बात का पालन न करे,या कोई किसी की बात का पालन नहीं करना चाहता और वो कह नहीं पाता / पाती तो उसके मन का गुब्बार एक दिन फूट पड़ता है । सीधी बात ये है कि इच्छाओं की पूर्ति न हो पाना क्रोध का मूल कारण है। हर कोई वस्तु,स्थान,अमुक व्यक्ति या कार्य आदि को अपने हिसाब से नहीं पाता या पाती तो उसे क्रोध आता है।

पर क्या क्रोध करना उचित है ? और उससे भी अधिक कोई क्रोध में हो तो दूसरा व्यक्ति उस क्रोध को दिखाए कि देखो कैसे बोल रही या रहा है। क्या ये एक प्रकार की चुगली नहीं है,किसी एक पक्ष की बात को सुनकर निर्णय ले लेना !या अपनी राय कायम कर लेना कहा तक उचित है ?

मैं ये नहीं कहती कि मुझे क्रोध नहीं आता। पर क्या फालतू बातों पर या फिर किसी के कहने पर या किसी और की सुनी बात को अंतिम फैसला मान कर क्रोध करना उचित है? यदि नहीं ! तो क्रोध करना ही क्यों है ? क्या हम वैसे नहीं रह सकते जब एक दिन या एक हफ़्ते या एक महीने का बच्चा होता है जिसे क्रोध का अर्थ ही नहीं पता होता है। सोना,जागना,हंसना आता है, बाक़ी चीजें तो वो माता - पिता,भाई - बहन ,घर के अलग - अलग सदस्यों,समाज के द्वारा सीखता है। वरना उसे इन सब बातों का कोई ज्ञान होता ही नहीं ।

तो कुल मिलकर सबसे पहले स्वयं पे काम करने की आवश्यकता है। जब आप अपने क्रोध पर संयम नहीं रख सकते तो दूसरे से ये अपेक्षा करना ही गलत है। और दूसरा उम्मीद मत रखिए क्योंकि उम्मीद का टूटना भी क्रोध का कारण होता है।




Babita 💕 🧿 

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