घर - घर
शादी के बाद सब कुछ बदल जाता है ? शायद हां पर इस सब कुछ में एक लड़की ज़्यादा बदलती है। और सबसे बड़ा बदलाव घरवाले होते है,जिनके साथ बचपन से रही उस परिवार को छोड़कर नए परिवार में जाना । कहना बहुत आसान है तुम्हारी फैमिली है,ये भी तुम्हारा घर है ! पर क्या वाकई ? मेरा घर मेरा परिवार पर मेरे घर के लोग कोई बात नहीं छुपाते थे । न कभी इसकी बात उससे,न उसकी बात इससे करते थे । पर यहां सबको समझना कितना कठिन है,सब एक हठी बालक की तरह है।
सबको बस ये दिखना है मैं काम कर रही हूं तो मेरा नाम हो । लोग तारीफ़ करे,पर अगर घर अपना है ! घर के लोग अपने है तो काम मिल बाट के क्यों न किया जाए । थोड़ा ये थोड़ा वो क्यों ? और जॉइंट फैमिली या संयुक्त परिवार कैसा ? जहां केवल खाना साथ बन रहा हो । बाकि सारी चीजें अलग - अलग हो ? मेरे आए यहां ज़्यादा समय तो नहीं हुआ पर इतना समझ आ गया है, एकता का नारा देकर सब बस छुप रहे है। प्रश्नों से की नई बहु कुछ पूछ न ले ?
पर सबसे बुरा तब लगता है,जब आपका अर्धांग ही आपसे खुलकर बात न करे । वो आपके मन की सारी बातें जाने,पर अपने मन की न कहे। तो फिर विवाह में लिए गए सात वचनों का कोई अर्थ ही नहीं है,सब केवल एक दिखावा ढकोसला मात्र है। जिसमें लड़की को कोई बात पता ही नहीं होती है। क्या शादी का अर्थ मात्र एक लड़की को घर पे ला कर औरों से उसका आकलन करना है। एक घर में बराबरी का हक़ नहीं तो घर अपना कैसे हुआ ? मात्र कह देने से की ये तुम्हारी मां है,या बहन है,भाभी,भैया है कहने से कोई अपना हो जाता है!
घर लोगो से बनता है,पर एक को खुशी देकर सबको दुःखी कर दो तो फिर खुशी कैसी? घर में अगर पांच स्त्री है तो पांचों को सामान अधिकार मिलना चाहिए। एक को अधिक और एक को कम ये कैसा न्याय है? एक को सारी चीजों का पता हो और एक को बेजान रद्दी का ढेर समझा जाए ,क्या उचित है? कहा जाता है कि बीती बातों पे मिट्टी डालना चाहिए और अगर आप मिट्टी नहीं डाल सकते तो दिखावे का रिश्ता नहीं रखना चाहिए। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती जब तक आप स्वयं अपनी आंख कान से बात को देखे सुने न तब तक निर्णय नहीं लेना चाहिए। पर यहां सबका अपना ईगो है,किसी का बीती बातों को लेकर,किसी को कमाई को लेकर,किसी का घर को लेकर ,और सब इस ईगो में ये भूल गए है। की कोई खुद से कहे चाहे नहीं ऊपर वाला सबको देख रहा है। सबका सही गलत सब वो भाप भी रहा है।
कभी - कभी मैं खुदको दो बाटो के बीच फंसा हुआ पाती है। या यू कह लो सब कुछ धुंधला नज़र आ रहा हो। और अगर सब चीज़ ऐसी ही रहनी है तो इससे अच्छा अपने लिए एक रास्ता चुना जाए । कम से कम वो रास्ता तो अपना होगा वो मंजिल अपनी होगी। न किसी से बैर,न आगे पीछे होने की होड़ लगेगी जो होगा जैसा होगा वो सब मेरा स्वयं का होगा। और मुझे अधूरा भी नहीं लगेगा ,जो अब धीरे - धीरे लग रहा है।
Babita 💕 🧿

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