छोटी सी बात
मुझे फ़र्क पड़ता है हर छोटी चीज़ से,क्योंकि मैने कभी नहीं देखा इन सारी बातों को होते हुए । अपना कहते है सब, अपना लगता कहा ? अरे छोटी सी बात है........पर वो बात मुझसे क्यों नहीं है ? बात आपसे है मुझसे नहीं ! ये समझाना कितना कठिन है जो मैं महसूस कर रही हूं । वो आपको समझा पाना कठिन है, शोख पूरे होने में और शोख एडजस्ट करने में अंतर है । सब तुम्हारा मेरा नहीं ,मैने कभी लाइट या पानी के लिए नहीं सुना हां बचत करनी चाहिए।पर बचत का अर्थ ये है कि मेरे कमरे की एक लाइट को भी गिना जाएगा कि मैं जलाती हूं पूरी रात । वो भी किसके लिए अपने बच्चे के लिए,बुरा लगता है जब मुझसे कुछ और,और आपसे कुछ और कहा जाता है। पता नहीं पर आपको कैसे नहीं दिखता ? पर मुझे दिखता खाने - पीने उठने बैठने में अंतर को देख ।
मैं रही हूं एक परिवार एक घर में जहां लड़ाई भी हुई है । पर कोई चाय पीने के लिए नहीं टोकता,जहां चाय, कॉफी,जूस किसी से पूछना नहीं पड़ता कि पीयू की नहीं । जहां एक को हर चीज की छूट दूसरे को किसी चीज की नहीं । अंतर तो है ,आप मानो चाहे नहीं, रह जरूर रही हूं पर खुल के कहा। पसन्द तो एक की ही पूरी होती है,वो न रूठ जाए ,मैने अपने घर में नहीं देखा था चलो माना वो भी मेरा अपना घर नहीं । पिता के घर में,जहां बिना पंखे के सोने पे कोई न कोई मुझे बोलता की बिना फैन के क्यों बैठी है। यहां ठीक उल्टा ,घर तो ये भी मेरा नहीं है। घंटों एक कमरे में बैठ के मैं थक जाती हूं,रोज एक सा काम । अरे बिना दुपट्टे के छत पे हो रात के 4 बजे है कौन देखेगा मुझे ,और ठीक इसके विपरीत उसे तो भरी दोपहर में कोई नहीं टोकता। तब गुस्सा आता है बुरा लगता है, मैं ऐसी नहीं थी न हूं पर ये भेद साफ दिखता है । पर आपसे कहना का मतलब ही नहीं,क्योंकि मैंने आपको भी देखा है झूठ कहते हुए।
विवाह में सच्चाई होती है किसी को मानना अलग है। पर एक तरफा हो जाना अलग है,छोटी सी बात तो है बिजली,पानी,राशन,खाना,खाना बनाना,पूजा,उपवास,छत,बालकनी,अब वाईफाई,मेरा सामान ऑर्डर करना या यूं कहूं हर चीज। जो मुझे 24 घंटे दिखती है आपको नहीं। मेरी चुप्पी,मेरा बोलना,चलना उठना बैठना सब ,उफ़ थक गई हूं । शायद ही इतना में ऊबती होंगी किसी चीज से, क्यों जरूरी है तुम्हारा बोलना मेरे कमरे में तो कोई नहीं आता कि बच्ची को देख लूं। पर तुम रहते हो तो सब पूछते है फर्क है न। नहीं रहता बंद कमरा और अगर बंद है तो कोई आ कर खटखटा नहीं सकता जवाब आया तो जागे है वरना नहीं।क्यों मैं देखू कि किसे बुरा लगा रहा है किसे अच्छा,कोई मुझे भी तो देखे।
मोबाइल कितना जरूरी है न तुम्हारा बदलाव ही मुझे तकलीफ दे गया। बात करने का अर्थ ये है कि फोन पे बात करूं,एक फिल्म एक सीरीज देखने का वक्त है किंतु पत्नी को आलिंगन में लेना का नहीं।तो शक तो होगा ही न और तुम्हे समझा पाना उतना ही कठिन,कौन सीढ़ी से जा रहा है आ रहा उससे बात करने के लिए वक्त है। ऊपर गई थी नीचे जा रही हो,कम पड़ गया खाना,अरे अब तुम्हारी मां तुम्हे डांटेगी,रुको इसके लिए ये करना है उसके लिए वो, इन सारी चीजों में मैं कहा हूं? किसी के लिए नेट का सूट,किसी के वॉट्सएप स्टेटस को देख कर तुम ठीक हो न । क्यों जरूरी है इतना एक का जन्म दिन से लेकर सब याद है अरे उससे गिफ्ट में एयरपोड दे दो। मेरे हिस्से का तो कुछ नहीं दिखता मुझे,नजरों से नजरे मिलाना और चुराना सब दिखता है। मेरे साथ यूं भेद क्यों ?
बात पूछी जा सकती है इत्मीनान से पर पूछूं किससे ये सब तो छोटी बाते है? जो बस मुझे बड़ी लगती है............???
Babita 💕

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