पेड़ो से पत्तों को गिरते देखा है

 पेड़ो से पत्तों को गिरते देखा है,धीरे - धीरे सब बदलते देखा है ।

कानो सुनी बातों पे नहीं,अपनी आंखों पे यक़ीन करके देखा है।

दिन,महीने,साल की तरह हम ने तुमको बदलते देखा है।

सच कहा तुमने मेरा बसेरा कहा है।

टूटी हुई टहनी का,जुड़ पाना भी एक खेला है।

कुछ चीजें देख के अनदेखी की है मैने ।

तुम्हे क्या पता टूट के चाहना क्या है।

यक़ीन नहीं करते हम यूं ही किसी पे।

भरोसे को मिट्टी में मिलते देखा है 

पेड़ो से पत्तों को गिरते देखा है, धीरे - धीरे सब बदलते देखा है।

अकेले चलने से हम कतराते नही है।

पर रास्तों को बदलते देखा है।

मिट्टी की मूरत को मिट्टी में मिलते देखा है।

झूठ को सच के मुखौटे में लिपटे देखा है।

न जाने कितनों को ये खेल खेलते देखा है।

पेड़ो से पत्तों  को गिरते देखा है, धीरे - धीरे सब बदलते देखा है।

शक पे नहीं, यकिन पे इल्ज़ाम लगाते है।

दबे पांव चिड़ियों को  आते देखा है।

झोपड़ी  को महल होते देखा है।

हर  दिन  को ढलते देखा है।

पेड़ो से पत्तों को गिरते देखा है, धीरे - धीरे  सब बदलते देखा है है।


Babita 💕 








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