भोर की कहानी
कितना अच्छा लगता है अकेले भोर की किरणों को निहारना,चिड़ियों की चचहाट,वो मंद - मंद पवन का बहना,हर ओर बस शांति और इस शांति के बीच "मैं" । हां खुद को भूलना इतना आसान कहा है ? जानते है ? जब अंदर का शोर चीख रहा हो या चीख चुका हो,तब आपको एकांत प्रिय होता है,जहां केवल आप है और कोई नहीं। कई बार मैं ये सोचती हूं ? शायद मुझे अपनी बात रखनी नहीं आती,या शायद मुझ में ही कुछ कमी है,जो भी हो पर मैं खुदको बहुत पसंद करती हूं.......हा हा हा हा........ अब जो भी समझिए ,आप मेरे बारे में क्या समझेंगे पता नहीं । पर आप मेरी लेखनी के बारे में जरूर कहिएगा। हां - तो मैं कहा थी; एकांत में शोर शराबे से दूर खुद के साथ, जानते है ! बचपन से ऐसे ही हूं "मैं" भीड़ में भी अकेली मुझे कभी वो साथ मिला ही नहीं ,और इसका कारण मेरी समझा न पाने की क्षमता है। कहने को तो ये ज्वाइंट फैमिली है पर मैं एक बात बखूबी समझ गई हूं । फैमिली ज्वाइंट हो या न्यूक्लियर आपको सबके आगे पीछे घूमना होगा,क्योंकि आपको लोग चोट पहुंचा सकते है क्योंकि वो उनका अधिकार है। पर आपको फिर भी उनकी जी हजूरी करनी है,जानते है मतभेद धीरे - धीरे मन भेद में बदल जाता है। और जब तक ये बात दूसरों तक पहुंचे तब तक सब और सन्नाटा होता है ।
कभी - कभी लगता है सब कुछ लिख दूं पर फिर विचार बदल जाते है। यहां गलत को गलत नहीं कह सकते क्योंकि ये आपका घर नहीं है,न ही आपको ऐसा महसूस होता है। बस आप सबकी सुनिए वरना लोग कहेंगे .........आरा हिले छपरा हिले बलिया हिले .............फिर इसे डीजे पे फूल वॉल्यूम पे बजाया जायेगा । सही भी जरा अलग मिजाज़ की जो हूं । जानते है सबकी पसंद जरूरी होती है,और बाकियों की पसंद आप पर थोप दी जाती है। पर इसमें भी आप गलत है । शायद अलग दुनिया है मेरी और ये पूरा अलग, कोई दूसरा शिकायत करे तो सही पर आप करे तो तुलना । आपका कुछ मांगना गलत पर दूसरे के लिए करना सही । खैर जाने दीजिए आदत तो नहीं हुई है,पर धीरे - धीरे आदत हो जाएगी। क्योंकि आप को तोला जा रहा है।
भोर का सूरज कितना सुंदर लगता है पूरा लाल और साथ में पीले पन की छटा लिए । जैसे लगता है उसे निहारते रहूं,पर दिन चढ़ते - चढ़ते आग उगलने लगता है। कही न कही मुझे भी ऐसे ही होना चाहिए या हर लड़की को होना चाहिए ताकि कोई उसे दबा न सके । न अपनी ऊंची आवाज़ में न,शहद जैसी बातों में, चिढ़ हो गई है मुझे अब मन नहीं करता। मन करता है सब जगह से दरवाज़े,खिड़की बंद करके पर्दे लगा के रहूं । क्योंकि यहां सब ने माला पहनी है एक दो लोगो की नाम की और मैं उस माला का जाप नहीं कर पाऊंगी। इतनी चापलूस रहती तो शायद प्रोफ़ेसर रहती,जैसे एम. ए के कुछ छात्र दिन भर टीचरों की चापलूसी में गुजारते थे वैसे .......मेरी बात को किसी और तक पहुंचना और खुद अच्छा बन जाना । आंखे बंद नहीं है ........
ऊफ़ में कहा से कहा पहुंच गई .............फिर कभी लिखूंगी अपनी भोर की कहानी
Babita 💕


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