रंगमंच/धारावाहिक

कई दिन से कुछ लिख नहीं रही थी, आज समय मिला तो सोचा कुछ लिख लिया जाए । वैसे तो अपने जीवन के अलावा लोगों के जीवन पर कुछ लिखना चाहती हूं पर क्या करे किस्से,कहानियां मेरे ही इर्द - गिर्द घटते रहते है । आपने नाटक,रंगमंच,कहानियां आदि देखी या पढ़ी होगी,और कुछ नहीं तो टीवी धारावाहिक तो न चाहते हुए भी देखी होगी । क्योंकि घर की कोई स्त्री चाहे मां हो या दादी,नानी,बुआ,मौसी, कोई तो एक धारावाहिक जरूर देखती है। आप सोच रहें होंगे अचनक से टीवी सीरियल की चर्चा क्यों कर रही हूँ! क्योंकि कही न कही मुझे मेरा ससुराल एक लाइव टीवी सीरियल लगता है । जहां ड्रामा कूट - कूट के भरा है,मानो एकता कपूर खुद लिख रही हो हा हा हा हा हा हा  । नहीं  बाबा आप मुझे गलत मत समझिए कि मैं शिकायत या ताने देने के लिए लिख रही हूं । पर जितने दिन से यहां हूं,तब से यही लगता है,हर कोई बस उसने कुछ कहा तो नहीं मेरे बारे में,उसकी उससे बनती बहुत है,अरे वो बोलती बहुत है और बहुत कुछ पर सबके मन में सबके लिए भरा पड़ा है, आप समझदार है क्या भरा है ये आपको पता ही है । पर हम पीठ पीछे बोल के सुख लेंगे,मुंह पे तो बोल नहीं पाएंगे, युधिष्ठिर जी का श्राप स्त्रियों पे काम तो किया है। जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूं कि युधिष्ठिर जी को जब पता चला, कर्ण उनका सगा भाई है ,और कुंती ने ये बात उनसे छुपाई थी । तब युधिष्ठिर जी ने श्राप दिया, कि स्त्रियों के पेट में कोई बात नहीं पचेगी हाहाहाहा  ....................... जी इसलिए तो  मेरे पेट में भी तो नहीं पची तो में लिखने बैठ गई । जैसे हर पुरुष का रोल कम होता है वैसे ही यहां है,पर स्त्रियां उसकी बाते मेरी बातों से मीठी या खट्टी क्यों ? उसके दीवार का कलर मेरे दीवार से अच्छा कैसे? उसकी पेट की बात मैं कैसे जानू, बीच में खबरी छोड़ना पड़ेगा कोमलिका आ हा.........अनुराग सिर्फ़ मेरा है, यहां सिर्फ मेरे चर्चे होंगे हा हा हा हा 
भाई साहब वो कोकिला का डायलॉग था न कुकर में चने किसने बैठाये बस यहां बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं है । पर फील वही है, सुबह से स्टार्ट रहते रात को सोते वक़्त ही इनका बैंकबिचिंग खत्म होता होगा। या फिर सपनों में भी वही चल रहा होगा । मुंह पे बोलना शायद गलत है पर अगर किसी से अधिक परेशानी है,तो या तो मैं सीधे बोल दूं या फिर अपने कमरे में रहूं । पर दिन भर प्रपंच और माया में फसना । मुझे ऐसा लगता कही न कही दिमाग को कमज़ोर कर देता है। जबरदस्ती किसी को अच्छा या बुरा बनाना सही नहीं,एक ही किताब या कहानी हज़ार लोग पढ़ते है। पर उसका वर्णन अपने तरीके से करते है। अगर किसी को किसी से नफ़रत या शिकायत है,तो किसी के कहने से वो नहीं बदल सकती । किसी के बारे में बातें करना गलत नहीं है पर हर दिन,ऐसा नहीं,वैसा नहीं,ऐसे उठो ऐसे बैठो,वो ऐसी बैठती है। रुकिए ज़रा एक तो कंपेयर करना छोड़िए और दूसरा खुद भी अपने में मगन रहिये दूसरों को भी रहने दीजिए।
घर का शोर,बाहर का शोर...................बाहर लड़ाई होती है तो मानो सब पॉपकॉर्न ले कर एंजॉय कर रहे होते है। हर जगह बेहिसाब शोर है,वो भी बेमतलब का, और प्रपंच भी । माना भगवान ने जबान दी है पर इसका ये अर्थ नहीं कि बोलते जाए,और इसका अर्थ ये भी नहीं कि पक्षपात और न इंसाफ़ी को झेलते जाए । पर दिमाग़ और दिल से सोचिये कैल्मनी करना सही नहीं है। 
जरूरी तो नहीं कि स्वाद सिर्फ आपसे हो जिसको जो पसंद है उससे भी हो सकता है,एक और बात "झूठ" पहले मुझे लगता था कुछ प्रतिशत तो सच बोल ही लेते होंगे लोग ?पर नहीं ! बहुत कम लोग ही सच बोल रहे है। वरना तो कलयुग का प्रभाव यहां साक्षात् देखने को मिलता है। कब कौनसा बम आपके नाम पे फोड़ दिया जाएगा ये स्वयं आपको भी नहीं पता। और सबकी अपनी फिलॉसफी है,की हम जिसका साथ दे रहे है वही सच्चा है। बैंकबाइटिंग,झूठ, छल,प्रपंच और न जाने क्या - क्या देख कर अब लगता है। संन्यास ले लिया जाए हा हा हा हा हा हा हा हा ..................हर किसी को बुरा लगता है,पर हर कोई आपकी तरह नहीं होता,हर कोई पीड़ा में है,कोई अपनी पीड़ा बताता है, कोई नहीं पर इसका अर्थ ये नहीं उसकी पीड़ा आपसे कम है, "श्रेष्ठ"आदमी चार लोगों के कहने पे नहीं बन सकता,श्रेष्ठ आदमी अपने विचार,अपने भाव, माया रहित हो के बनता है। ज़बरदस्ती किसी को गद्दी देने की कोशिश करना,और कोई सच में उस गद्दी का हकदार है,दोनों में अंतर है । आपके कहने से कोई राजा या रंक बनता तो बात ही कुछ और होती । आग में घी डालने से कई बार खुदके हाथ भी जलते । चले या बाते सोच समझ के करनी चाहिए क्योंकि आज नहीं तो कल पर्दा उठेगा और सच दिखेगा ।छुपाया हुआ हो या झूठ वाला हो ।
चलिए टीवी सीरियल शुरू होने का समय हो गया आज देखे किसकी दाल काली है,या नमक नहीं है हाहा हा हा हा हा हा हा हा द शो मस्ट गो ऑन !




Babita 💕 


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